Archive for September, 2010

18
Sep
10

बेबस अनमोल

खवाब को पानी बनाकर ले गयी, क्या करू ?
वो मेरी नींदें उड़ा कर ले गयी, क्या करू ??

वो जो मीठी नींद के मानिंद आई थी कभी,
मेरे सपने ही चुरा कर ले गयी , क्या करू ??

बहते अश्को को तो पल्लू चाहिए था प्यार का,
वो तो रुमाल भी चुरा कर ले गयी क्या करू ??

अब बढ़ने लगे हैं बेकाली के दायरे,
रंग चेहरे का चुरा कर ले गयी, क्या करू ??

मेरे सारे ख़त जला के राख उसने कर दिये ,
अपनी तहरीरें उठा कर ले गयी है, क्या करू ??

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