12
Jan
11

मुझे अपने आप में ही जीने दो

ज़िन्दगी में आँसू के घुट पिके,
हर लम्हा चिंता में जी के,
तड़प उठी है आत्मा मेरे अंदर,
और बन चूका हु मैं ग़म का समंदर !

कई बार लाई गयी झूठी मुस्कान,
करके बंद अपने ग़म की दूकान,
वह भी थी पलभर की मेहमान,
मन ही मन था अनमोल हमेशा परेशान !

चिंताओ के बादल घनघोर होने लगे,
इधर बाल भी सफेद होने लगे,
थी अपने अंदर इनती पीड़ा,
जो दिमाग में बन बेठी थी कीड़ा !

सब थे अपनी-अपनी ज़िन्दगी के खेल में इतने व्यस्त,
पर करने आ जाते थे बार-बार मुझे आश्वस्त,
उनकी ख़ुशी भरा जीवन देख,
नहीं बता पाता अपने दिल की बात !

ऐ दुनिया वालों,
काटों को चुभने दो तन में,
अब ना आस रही सुख की जीवन में,
करो ना चिंता मेरी मन में,
घोर यातना ही सहने दो !

मुझे अपने आप में ही जीने दो !

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