Archive for the 'Poems' Category

18
Mar
11

कलयुग

इस अनजाने दोर में,
शाम या सवेर में,
ज़िन्दगी से भरे हर कोने में,
हर इंसान अपने आप को खुदा समझने लगा है !

हर इंसान का गुरूर चरम पर है,
अब तो उसके पाँव भी ज़मीं से कई किमी ऊपर है,
हर कोई चाहता पैसा अनाप सनाप,
आ जाने पर भी खत्म ना होती उसकी धाप !

सब जगह मची हुई है लूट,
दिन ब दिन बढ़ती पैसे की भूख,
भ्रष्टाचार हुआ इतना आम,
पैसे खिलाये बिना न बनता कोई काम !

रिश्ते भी अब नाम मात्र के है,
ग़नीमत हैं माँ-बाप व बच्चों का रिश्ता अभी भी पवित्र है,
इन दिनों रिश्ते भी पैसो से तोले जाते है,
दिल बड़ा हो, पर पैसा नहीं तो रिश्ते तोड़े जाते है !

सच्चा प्यार तो इन दिनों नाम मात्र का है,
ये तो मेकअप ब्रेकअप का ज़माना है,
यहाँ हर लड़की को फ्री मे रेस्तरों मे खाना है,
माँ-बाप से छुपाकर बॉयफ्रेंड को सब कुछ बताना है !

“दोस्ती” शब्द का तो जैसे मयाना ही बदल गया है,
जब कोई काम हो तभी दोस्त याद आना है,
कई लोग अपने आप को दोस्त कहते है,
ज़रुरत पड़ने पर मुह छुपाते फिरते है !

आजकल तो पढ़ाई के नाम पे भी लुटा जाता है,
फीस अडवांस में लेकर ज्ञान बाटा जाता है,
मास्टर भी हुए बड़े होशियार, स्कूल में करते प्रचार,
घर पर लेते टयुशन के बैच चार-चार !

गरीब की हुई हालत खराब,
पर कौन सोचे उनका जनाब,
रहीसों के पास है बंगले चार-चार,
फिर भी नहीं दे पाते गरीब को पैसे चार !

…………………………

अनमोल राजपुरोहित

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12
Jan
11

मुझे अपने आप में ही जीने दो

ज़िन्दगी में आँसू के घुट पिके,
हर लम्हा चिंता में जी के,
तड़प उठी है आत्मा मेरे अंदर,
और बन चूका हु मैं ग़म का समंदर !

कई बार लाई गयी झूठी मुस्कान,
करके बंद अपने ग़म की दूकान,
वह भी थी पलभर की मेहमान,
मन ही मन था अनमोल हमेशा परेशान !

चिंताओ के बादल घनघोर होने लगे,
इधर बाल भी सफेद होने लगे,
थी अपने अंदर इनती पीड़ा,
जो दिमाग में बन बेठी थी कीड़ा !

सब थे अपनी-अपनी ज़िन्दगी के खेल में इतने व्यस्त,
पर करने आ जाते थे बार-बार मुझे आश्वस्त,
उनकी ख़ुशी भरा जीवन देख,
नहीं बता पाता अपने दिल की बात !

ऐ दुनिया वालों,
काटों को चुभने दो तन में,
अब ना आस रही सुख की जीवन में,
करो ना चिंता मेरी मन में,
घोर यातना ही सहने दो !

मुझे अपने आप में ही जीने दो !

18
Sep
10

बेबस अनमोल

खवाब को पानी बनाकर ले गयी, क्या करू ?
वो मेरी नींदें उड़ा कर ले गयी, क्या करू ??

वो जो मीठी नींद के मानिंद आई थी कभी,
मेरे सपने ही चुरा कर ले गयी , क्या करू ??

बहते अश्को को तो पल्लू चाहिए था प्यार का,
वो तो रुमाल भी चुरा कर ले गयी क्या करू ??

अब बढ़ने लगे हैं बेकाली के दायरे,
रंग चेहरे का चुरा कर ले गयी, क्या करू ??

मेरे सारे ख़त जला के राख उसने कर दिये ,
अपनी तहरीरें उठा कर ले गयी है, क्या करू ??

13
Aug
10

अनकही भावनाए

जब देखा मैंने उसे पहली बार,
हो गया था मुझे उससे प्यार !

करती थी वो आँखों से बार-बार प्रहार,
नज़र मिलते ही हो जाती थी मेरी हालत ख़राब !

उससे बात करने को तरसता था दिल,
कहीं खो न दू डरता था दिल !

वो जब-जब दिख जाती,
ज़िन्दगी रौशनी से भर जाती !

वह प्यारी सी सूरत, वह लाजवाब चेहरा,
छुप छुप देखता था मैं उसे ठहरा-ठहरा !

कई बार हुई उससे अकेले मुलाकात,
पर कह नहीं पाया दिल की बात !

शायद कुछ था उसके भी मन में,
जो नहीं कह पाती थी वो शब्दों में !

जिस दिन ना होती उससे मुलाकात,
लगता था कैसे गुजरेगा यह दिन और रात !

पता थी उसे भी मेरे दिल की बात,
शायद इसीलिए खाती थी इतने भाव !

अभी भी बाकी है तीन और साल(कॉलेज में),
पर ना जाने कब खत्म होगा यह इंतज़ार !

जब होगा यह इंतज़ार खत्म,
तब रहेगी ज़िन्दगी में रोशनी हरदम !

अनमोल राजपुरोहित

07
Jun
10

घर-एक मंदिर

आज दिल में अजीब सा दर्द हुआ,

किस बात ने दिल को इतना अंदर से छुआ ?

था यह घर से दूर जाने का डर,

जिस घर में  रहते है मेरे भगवान अंदर !

अब उनके क्या चर्चे सुनाए,

आप सबको क्यूँ जलाए ?

वो है मेरे माता पिता,

जिन्हें मानता  हूँ  मैं अपना खुदा !

उनके संघर्ष के महल के सामने,

मेरा संघर्ष तो महज़ एक पान की दुकान तक ना था !

उनकी कुर्बानियों के सामने,

मेरी कुर्बानी, कुर्बानी ना रही !

उनके प्यार और संस्कार ने बना दिया मुझे काबिल,

समंदर से भी बड़ा है उनका दिल !

मुझे सफल इंसान बनाना था उनका सपना,

जो अब है लगता मुझे अपना अपना !

उनके दो बूँद आसूँ भी चुभते है दिल को,

इसलिए डरता है दिल घर छोड़कर जाने को !

मेरा वो हर दिन सफल है ऐ मौला,

जिस जिस दिन मैंने उनकी ख़ुशी को है तोला !

07
May
10

वाह रे वाह नारी !

वह प्यारी सी सूरत,

जैसे हो प्रेम की मूरत.

उसका सर झुकाकर शर्माना,

जैसे गुलाब के फूल बरसाना.

उसका मस्त अंदाज़ मे हँसना,

जैसे नया सूरज निकलना.

पहली ही नज़र मे हो गया था उसका दीवाना,

बहुत मुश्किल था उसको अपना बनाना.

हो गया था सच्चा प्यार,

जिसका पहले उसने किया इज़हार .

सबसे जुदा सबसे अलग थी वो,

भगवान की सबसे सुंदर “कृति ” थी वो.

हम अच्छे से घुल-मिलने लगे,

साथ ही साथ प्यार के झूले झूलने लगे.

हो गई थी मेरी सारी जेब खाली,

करते करते उसकी रखवाली .

रखता था उसका बहुत ध्यान,

क्योंकि मैं था उसपे पूरी तरह से क़ुर्बान.

एक दिन हुई मुझसे गलती,

वह बोली “अब तुमसे नहीं बनती “.

कहाँ गई वो सूरत, वो हँसी,

जो कल थी यहीं कहीं ?

उसने की कलाकारी,

और बना दिया मुझे ब्रहमचारी.

अब कहाँ जाए यह ब्रहमचारी,

लेकर उसकी यादें सारी ?

दे दी मुझे जिंदगी भर की सज़ा,

और खुद करने लगी दूसरों के साथ मज़ा.

वाह रे वाह नारी,

हिला दी उसने मेरी दुनिया सारी.

अब दुखता है दिल, बहुत तड़पता है दिल,

क्योंकि वही है मेरे दिल की असली कातिल.

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31
Mar
10

The Guilty Man

This poem is to the whole world  from a youngster who is fully frustrated with what all big blunders(mistakes) he has done till date in his life and is on the verge of committing suicide. Dipped in emotions this piece of art for you all. Kindly feel the situation, you will get to know his sentiments more precisely.Here you go……..

You understand bits and pieces of me

You think you know me

Alas! my world is not as carefree

Look into my eyes and you’ll find

A soul much darker than thee.

 

The blood that runs in my veins

Will dry up one day

And with it all the secrets that I didn’t share

Pray that you don’t find me on the dais someday

Speaking all that I couldn’t’ bear.

 

Dark are tomorrow’s eyes

Darker still was my past

For me, deceit and lies

For you, a man wishing his last.

 

Before I bend upon my knees

Put me in my grave

Alive, I can’t sleep in peace

For its hell, not heaven, that I crave.

 




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